कौसानी को अपनी अनुपम प्राकृतिक सुंदरता के कारण भारत का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। समुद्र तल से 1,890 मीटर की ऊँचाई पर बसा यह रमणीय स्थल अल्मोड़ा के उत्तर में लगभग 53 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में यह स्थान वलना नाम से जाना जाता था। महर्षि कौशिक के कठोर तप के कारण इसका नाम कौसानी पड़ा।
प्रसिद्ध हिंदी कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्मस्थली कौसानी ने अपने नैसर्गिक सौंदर्य से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी अभिभूत किया था। यहाँ की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। हिमाच्छादित त्रिशूल, नंदा देवी और नंदाकोट जैसी पर्वत चोटियाँ, हरी-भरी घाटियाँ और उनमें बिखरे रंग-बिरंगे फूल कौसानी को अद्भुत रूप प्रदान करते हैं। इसकी मनोहारी सुंदरता ऐसी है कि यहाँ आने वाला प्रत्येक पर्यटक सहज ही प्रकृति के आकर्षण में बंध जाता है।
कौसानी के आकर्षण
अनासक्ति आश्रम
यह वही पावन स्थल है, जहाँ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने वर्ष 1929 में अपने प्रवास के कुछ दिन बिताए थे। कौसानी की अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण से गांधीजी अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने अपने लेखों में कौसानी के सौंदर्य का वर्णन करते हुए इसकी ख्याति देश-विदेश तक पहुँचाई।
हिमालय की अनुपम शांति, शीतल हवा और मनोहारी प्राकृतिक दृश्यों के बीच स्थित अनासक्ति आश्रम आज भी पर्यटकों को आत्मिक शांति और मानसिक सुकून प्रदान करता है। आश्रम परिसर में एक पुस्तकालय भी है, जहाँ गांधीजी के जीवन, विचारों और साहित्य से संबंधित पुस्तकों तथा अन्य सामग्री का संग्रह है।
कटारमल
कटारमल सूर्य मंदिर 9वीं शताब्दी में कत्युरी राजा कटारमल्ल द्वारा निर्मित माना जाता है।
यह मंदिर अपनी विशिष्ट स्थापत्य कला, प्रस्तर एवं धातु की मूर्तियों तथा सुंदर नक्काशीदार स्तंभों और द्वारों के लिए जाना जाता है। शांत पहाड़ी परिवेश में स्थित यह प्राचीन मंदिर अपनी ऐतिहासिक महत्ता और स्थापत्य सौंदर्य के कारण पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।
बैजनाथ (19 कि.मी.)
कौसानी रिज के ठीक नीचे गोमती नदी के तट पर बसा बैजनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल और ऐतिहासिक केंद्र है। कत्युरी वंश के शासकों द्वारा निर्मित यहाँ के प्राचीन मंदिर नदी के किनारे स्थित हैं और अपनी स्थापत्य कला तथा मनोहारी प्राकृतिक परिवेश के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। यह क्षेत्र कत्यूर घाटी के नाम से भी जाना जाता है।
इन मंदिरों की कलात्मकता देखते ही बनती है। मुख्य मंदिर में माता पार्वती की अत्यंत सुंदर प्रतिमा स्थापित है। बैजनाथ में धनुषाकार रूप में बहती गोमती नदी का दृश्य भी मन को मोह लेता है। इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए यह स्थान अवश्य दर्शनीय है।
बागेश्वर (42 कि.मी.)
गोमती और सरयू नदियों के संगम पर बसा बागेश्वर उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण शैव तीर्थस्थल है। यह समुद्र तल से लगभग 960 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ भगवान शिव को समर्पित प्राचीन बागनाथ मंदिर है, जिसका निर्माण राजा लक्ष्मी चंद ने कराया था।
मंदिर के अलावा नदियों का पवित्र संगम भी तीर्थस्थल के रूप में विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है। यहाँ प्रत्येक वर्ष जनवरी के मध्य में उत्तरायण के अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से तीर्थयात्री और श्रद्धालु भाग लेने आते हैं।
बागेश्वर पिंडारी, कफनी और सुंदरढुंगा ग्लेशियरों की ट्रैकिंग के लिए एक आदर्श आधार शिविर भी है। धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और साहसिक पर्यटन—तीनों दृष्टियों से यह स्थान विशेष आकर्षण रखता है।
ग्वालदम (48 कि.मी.)
समुद्र तल से लगभग 1,629 मीटर की ऊँचाई पर स्थित ग्वालदम हिमालय का एक छोटा-सा, सुंदर नगर है, जो चारों ओर से हरे-भरे जंगलों और फलों, विशेष रूप से सेब के बागों से घिरा हुआ है। शांत और मनोहारी प्राकृतिक परिवेश के कारण यह प्रकृति-प्रेमियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है। ग्वालदम रूपकुंड ट्रेक के लिए एक प्रमुख आधार केंद्र है और क्षेत्र में कई अन्य ट्रैकिंग मार्गों तक पहुँच का महत्वपूर्ण पड़ाव भी है.

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