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Shaikh Ahmad Sirhindi (1564–1624)

Rauza Sharif / Image Credit Shaikh Ahmad Sirhindi was the most prominent saint of Naqshbandi Sufi silsila (order), one of the orders into which Sufis were organized. Chishti, Qadaria, Suhrawardy and Mawlawi are the other silsilas. Shaikh Ahmad Sirhindi was a disciple of Khwaja Baqi Billah, a pioneer of Naqshbandiah silsilah in India. Also known as Mujaddid-i Alf-i Thani, Shaikh Ahmed Sirhindi was born in 1564 at Sirhind (currently in the Fatehgarh Sahib district of Punjab). He died in 1624 at Sarhind where his shrine, known as Rauza Sharif, is located. Ahmad Sirhindi disapproved of the religious syncretism of Mughal emperor Akbar. Known for his orthodoxy and anti-Shia views, he was opposed to the Akbar’s religious views. A notable work of Sirhindi is Maktubat-e-Imam Rabbani in which he has referred to the execution of Guru Arjan Dev, the fifth Sikh Guru.   He had hailed the execution of Guru Arjan Dev, who was executed by orders of fourth Mughal Emperor Jahangir, who rule...
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बीजापुर: इतिहास और स्थापत्य की अनमोल विरासत

Gol Gumbaz in Bijapur (Karnataka) / Image Credit कर्नाटक के इस प्राचीन और ऐतिहासिक नगर की नींव चालुक्य वंश के शासनकाल में रखी गई थी। उस समय इसे विजयपुर के नाम से जाना जाता था, जिससे आगे चलकर इस स्थान का नाम बीजापुर पड़ा। कभी आदिलशाही राजाओं (1489–1686) की राजधानी रहा बीजापुर आज भी अपने भव्य ऐतिहासिक स्मारकों और स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। शहर की पहचान यहां मौजूद मस्जिदों, मकबरों, महलों, किलों, प्रहरी मीनारों और विशाल प्रवेशद्वारों से होती है। विश्व के विशालतम स्वतंत्र रूप से खड़े गुंबदों में से एक  गोल गुम्बज विशेष आकर्षण का केन्द्र है। आदिलशाही शासकों के शासनकाल में बीजापुर ने स्थापत्य कला के उत्कर्ष को देखा और आज यहां की इमारतों में उस दौर की कलात्मक प्रतिभा और वास्तु-कौशल की अद्भुत झलक मिलती है। मध्यकालीन मुस्लिम स्थापत्य कला में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए बीजापुर किसी खजाने से कम नहीं। शहर को केन्द्र बनाकर आप ऐहोल, बादामी और पट्टदकल जैसे दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण और दुर्लभ विरासत स्थलों की भी सैर कर सकते हैं। इतिहास, वास्तुकला और संस्कृति को करीब से समझने की चाह रख...

कौसानी

Photo: Pexels कौसानी को अपनी अनुपम प्राकृतिक सुंदरता के कारण भारत का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। समुद्र तल से 1,890 मीटर की ऊँचाई पर बसा यह रमणीय स्थल अल्मोड़ा के उत्तर में लगभग 53 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में यह स्थान वलना नाम से जाना जाता था। महर्षि कौशिक के कठोर तप के कारण इसका नाम कौसानी पड़ा। प्रसिद्ध हिंदी कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्मस्थली कौसानी ने अपने नैसर्गिक सौंदर्य से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी अभिभूत किया था। यहाँ की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। हिमाच्छादित त्रिशूल, नंदा देवी और नंदाकोट जैसी पर्वत चोटियाँ, हरी-भरी घाटियाँ और उनमें बिखरे रंग-बिरंगे फूल कौसानी को अद्भुत रूप प्रदान करते हैं। इसकी मनोहारी सुंदरता ऐसी है कि यहाँ आने वाला प्रत्येक पर्यटक सहज ही प्रकृति के आकर्षण में बंध जाता है। कौसानी के आकर्षण अनासक्ति आश्रम यह वही पावन स्थल है, जहाँ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने वर्ष 1929 में अपने प्रवास के कुछ दिन बिताए थे। कौसानी की अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण से गांधीजी अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने अपने लेखों में कौसानी...

अमरनाथ: हिमालय की गोद में आस्था का अद्भुत धाम

कश्मीर की लिद्दर घाटी में स्थित श्री अमरनाथ की गुफा प्रकृति और आस्था के अद्भुत संगम का प्रतीक है। समुद्र तल से लगभग 3,680 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह पवित्र गुफा बर्फ से ढकी ऊँची पर्वत चोटियों और मनोहारी प्राकृतिक दृश्यों से घिरी हुई है। यहां पहुंचकर श्रद्धालु हिमालय की आध्यात्मिक ऊर्जा और अलौकिक शांति का अनुभव करते हैं। हर वर्ष श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) में देश-विदेश से श्रद्धालु प्राकृतिक रूप से निर्मित बर्फ के शिवलिंग के दर्शन के लिए अमरनाथ पहुंचते हैं। इस हिम शिवलिंग को भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि चंद्रमा की कलाओं के साथ शिवलिंग के आकार में भी परिवर्तन होता है और श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर यह अपने पूर्ण आकार में दिखाई देता है। इसी कारण इस दिन अमरनाथ यात्रा में विशेष धार्मिक महत्व रखता है। श्रद्धालु पवित्र अमरावती नदी में स्नान करने के बाद अमरनाथ गुफा में पहुंचकर हिम से निर्मित शिवलिंग के दर्शन  करते हैं। कठिन पर्वतीय यात्रा के बावजूद लाखों श्रद्धालुओं के लिए यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, आध्यात्मिकता और हिमालय की विराट प्राकृतिक...

अंतीचक, भागलपुर

  Vikramshila Entrance / Image Credit अंतीचक बिहार के भागलपुर जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है, जहाँ प्राचीन विक्रमशिला विश्वविद्यालय के अवशेष मिले हैं। 8वीं शताब्दी में पाल शासक धर्मपाल द्वारा स्थापित विक्रमशिला वज्रयान बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र होने के साथ-साथ प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्रों में भी गिना जाता था। विक्रमशिला से तिब्बत भेजे गए बौद्ध विद्वानों और आचार्यों के माध्यम से 11वीं शताब्दी में तिब्बत में वज्रयान बौद्ध धर्म के प्रसार को महत्वपूर्ण गति मिली। इस प्राचीन विश्वविद्यालय परिसर में मठ, मंदिर और स्तूप सहित अनेक संरचनाओं के अवशेष पाए गए हैं। 1960-61 में किए गए पुरातात्विक उत्खनन के दौरान यहाँ पत्थर और मिट्टी से निर्मित बुद्ध की अनेक प्रतिमाएँ प्राप्त हुईं। ये अवशेष विक्रमशिला की समृद्ध बौद्ध परंपरा, स्थापत्य कला और प्राचीन शैक्षणिक विरासत की महत्वपूर्ण झलक प्रस्तुत करते हैं।

कुंभकोणम: प्राचीन मंदिरों और आस्था की नगरी

कुंभकोणम: प्राचीन मंदिरों और आस्था की नगरी तंजावुर जिले में स्थित कुंभकोणम दक्षिण भारत के प्राचीन और पवित्र नगरों में से एक है। शैव और वैष्णव परंपराओं में समान रूप से महत्वपूर्ण यह नगर अपने प्राचीन मंदिरों, स्थापत्य कला, धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। कावेरी और अरसलार नदियों के बीच बसा कुंभकोणम और इसके आसपास अनेक प्राचीन मंदिर स्थित हैं। यद्यपि कुंभकोणम का उल्लेख प्राचीन काल से मिलता है, लेकिन मध्यकालीन चोल शासन के दौरान, विशेषकर 7वीं शताब्दी के बाद, इस क्षेत्र ने महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में अपनी पहचान बनाई। ब्रिटिश शासनकाल में यहाँ मौजूद अनेक शैक्षणिक संस्थानों के कारण इसे कभी-कभी ‘दक्षिण भारत का कैम्ब्रिज’ भी कहा जाता था। हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाला प्रसिद्ध महामहम उत्सव कुंभकोणम की धार्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कुंभेश्वर मंदिर कुंभेश्वर मंदिर /  चित्र सौजन्य कुंभकोणम का नाम यहाँ के अधिष्ठाता देव कुंभेश्वर के नाम पर पड़ा माना जाता है। मंदिर से जुड़ी एक प्रसिद्ध किंवदंती के अनुसार, प्रलय के बाद भगवान शिव ने एक किर...

Some Great Indian Independence Leaders and Revolutionaries

Alluri Seetharama Raju Alluri Seetharama Raju is known in Indian history to have led the Rampa rebellion which took place in during 1922-24 against the British. He was born on July 4, 1897 in Pandrangi village in the Visakhapatnam district of Andhra Pradesh. He studied at Mrs. AVN College in Visakhapatnam. Rampa rebellion was one of the 70 listed tribal uprisings during the British colonial period from 1778 to 1947. What makes Rampa rebellion unique that it was the earliest known tribal revolt led by a non-tribal Alluri Seetharama Raju. Though an outsider, he assembled a band of followers who had the support of the people of the surrounding areas of at least 2,500 square miles. He became a folk hero in Andhra Pradesh and came to be known as Manyam Veerudu (Hero of the jungles). Though Mahatma Gandhi’s Non-cooperation Movement inspired him, he advocated violence to win tribal goals.  The revolt takes its name from the Rampa region north of Godavari, which was the place of ac...